Feziya khan

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धीरे धीरे से भाग --- 30



दीप्ती को चार दिन से बुखार आ रहा था उससे ना कुछ खाया जा रहा था ना ही चला जा रहा था बहुत कमजोर हो गई थी बाथरूम मे गई तो वहाँ चक्कर खाकर गिर गई थी पता नहीं उसे की कितनी देर मे उसे होश आया,


ज़ब जाकर वो बाहर आई सर पर लगने के कारण उसे बहुत दर्द हो रहा था जैसे तैसे वो अपने कमरे मे आई वीर बैठा हुआ फ़ोन चला रहा था उसने उसे देखा भी नहीं की, ज़ब दीप्ती ने कहा की वो गिर गई तो उसने उसकी तरफ देखा सर मे दवाई लगा कर फिर फोन मे लग गया, रात को फिर वो दीप्ती के करीब आया और उसे अपनी बाहों मे भर कर उसे किश करने लगा दीप्ती ने बहुत माना किया अपनी हालत की दुहाई दी पर वीर कब सुनता था जो आज सुनता दर्द और कमजोरी के मारे वो चीखती रहीं वीर के कानो मे उसकी आवाज जाते हुए भी अनसुना कार दिया और उसने दीप्ती का मुँह बंद कर दिया,,



दीप्ती आँखो मे आँसू लिए सिसकती रहीं वीर सो गया,

दीप्ती की आँखो मे नीद कोसों दूर थी,,,,



वर्त्तमान मे डूबी दीप्ती ज़ब लोटी ज़ब उसने वीर का हाथ अपनी कमर पर फिर से पाया जो नीद मे भी उसकी कमर को सहला रहा था,,,, 



वीर का हाथ ज़ब दीप्ती की खुली कमर पर पड़ा तो उसके मन मे फिर से चेतना जागने लगी दीप्ती का कुछ भी बोलना बेमानी सा लग रहा था वो एक जिन्दा लाश की तरह हो गई थी बिना ना नुकर किये उसने फिर से खुद को वीर के हवाले कर दिया था 



वीर फिर से सुकून की नीद सो गया था पर दीप्ती इस ज़िन्दगी को कोस रहीं थी 


उसकी ज़िन्दगी में जो खुशी के अनमोल पल थे वो शादी से पहले के दिन थे अब तो बस दीप्ती एक बोझ भरी ज़िन्दगी जी रही थी कभी उसकी ऐसी ज़िन्दगी का अंत होगा कि नहीं कभी उसे अपनी गलती का एहसास होगा कि नहीं दीप्ती एक औरत के साथ साथ उसकी बीवी भी हूँ कोई खिलौना नहीं I जिसे वो ज़ब चाहे अपना निशाना बना लेता है l 





दीप्ती अक्सर सोचती थी शादी से पहले कैसे रहता था यें, उसे कभी यकीन ही नहीं हुआ की उसका किसी के साथ कोई रिश्ता ना रहा होगा,,,


आज उसे मोहन की याद आ रहीं थी काश वो थोड़ी हिम्मत दिखा लेती तो आज ये दिन देखना नहीं पड़ता पर उसकी इस 


 एक गलती ने सब बर्बाद कर दिया उसने वीर को अच्छा आदमी समझा और वो क्या निकला अब तो यें ऐसा लगता था जैसे किसी ने सुनहरे सपने से झांझोर दिया हो दीप्ती को,,,


कितने सपने सजाये थे अपने जीवनसाथी को लेकर पहले खुश होती थी आज उतनी ही मेरी आँखों से अश्क़ बहते है l


यही सोचते सोचते दीप्ती की आँखों से अश्कों कि धारा फूट पड़ी,,,



ज़िन्दगी के इस दर्द से दीप्ती इतना टूट चुकी थी अब तो जीने कि कोई आस भी नहीं बची थी किसके लिए जियो जिसे कभी उसने प्यार समझ कर प्यार निभाया था उसके लिए तो वो बस एक दिल बहलाने का सामान थी प्यार तो एक उसके लिए छलावा था l शायद कभी प्यार था ही नहीं उसे दीप्ती से,,,,


एक दिखावे भरी ज़िन्दगी जी रही थी दीप्ती बाहर से ख़ुश रहने का दिखावा और अंदर से एक बेजान लाश इसकी रूह तक जख़्मी थी जिसने अपनी सिसकी भी दिल के कोने में दफ़ान हो कर रहे गई थी उसे खुद कि ही आवाज सुनाई नहीं देती थी शीशे की तरह चूर चूर हो चुकी थी वो l



 इतने साल भी बीत जाने के बाद भी उसकी ज़िन्दगी में कोई बदलाव नहीं आया जैसे पहले एक घुटन भरी ज़िन्दगी जी रही थी आज भी वैसे ही जी रही है कुछ हुआ है तो बस इतना नासूर बन गए है जख्म, जिसका कोई मरहम अभी तक उसे नहीं मिला है l



खुद से ही बाते करते करते कब सुबह हो गई मुझे पता ही नहीं चला चिडियो की चहचहट से दीप्ती अतीत की यादों से बाहर निकल आई रात भर की सिसकियों से टूटी हुए उसने खुद क़ो समेटा और फिर से लग गई अपने दिनचर्या के कामकाज में खुद क़ो भूलती हुई होठों पर बड़ी सी मुस्कुराहट के साथ बढ़ गई अपने अगले पड़ाव की तरफ..........




समाप्त



आप सब को मेरी कहानी कैसी लगी समीक्षा करके अवश्य बताए 🙏 


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1 Comments

Mohammed urooj khan

16-Oct-2023 12:02 PM

👌👌👌👌👌

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